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पराग के बारे में: काठमांडू

काठमांडू के वसंत ऋतु (मार्च-मई) में चीड़ और एल्डर के पराग कणों का दबदबा रहता है; शिवपुरी और नागार्जुन की पहाड़ियों पर चीड़ (Pinus roxburghii) के घने जंगल हैं; बागमती नदी के किनारे हिमालयी एल्डर (Alnus nepalensis) बहुतायत में पाए जाते हैं। गोकर्ण फॉरेस्ट रिजर्व से निकलने वाला ओक (Quercus) भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान देता है। ग्रीष्म ऋतु के उत्तरार्ध (जुलाई-सितंबर) में रत्न पार्क और बागमती के तटों से निकलने वाली घास (Poaceae) और मग्गवॉर्ट (Artemisia) का स्तर काफी बढ़ जाता है।

घाटी की कटोरेनुमा भौगोलिक बनावट सर्दियों के दौरान ‘तापमान विलोमन’ (temperature inversions) के कारण इन कणों को यहीं रोक लेती है। शरद और मानसून के महीनों में रानीपोखरी के पास के नम क्षेत्रों और गोदावरी बॉटनिकल गार्डन में सड़ती वनस्पतियों के कारण फफूंद (Alternaria, Cladosporium) बीजाणुओं की संख्या में वृद्धि देखी जाती है।

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पराग स्तरों का अर्थ
कम लक्षणों की संभावना कम
मध्य लक्षणों का मध्यम जोखिम
उच्च व्यापक लक्षण संभव
ब.उ. महत्वपूर्ण लक्षणों की उम्मीद करें
अ.उ. अत्यधिक उच्च लक्षण संभावना और गंभीरता